आवा म्यार पहाड़ – सीखो सिखाओ, करो कुछ नया!

अतीत में  हम सब संस्थाओं ने बहुत से सुंदर कैंपस बनाए, संवारे, बड़े जतन से | कई सम्मेलन, गोष्ठियां, विभिन्न कार्यक्रम किए; और भी बहुत कुछ किया, इन्हीं मनोरम प्रांगनो में बैठ कर, ताकि ग्रामीण समुदाय और विकास की ताकतें आपस में मिलें, एक दूसरे को समझें और जमीनी स्तर पर बदलाव का आगाज़ करें |

वक्त बदला, तकनीक  बदली;  वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग ने जगह ले ली, गोष्ठी और आँगन की; दानदाता की प्राथमिकता बदली;  हम भी बदले; सब कुछ एक नंबर गेम बन चला; विकास के पुरोधा ‘दुकाने’ संभालने में लग गए; उस पुराने आंगन के इर्द-गिर्द बसे गांव हाशिए पर सिमट गए; विकास बाईपास सर्जरी की तरह ग्रामीण समुदाय को बाईपास करता बढ़ चला | वे पुराने कैंपस बेमानी हो गए;  एक  रात गांव में बिताना, लोगों से गपशप करना, चाय पीना – वह सब बीते युग की बातें बन गई | इनकी जगह ले ली –  9 से 5 के अति-व्यस्त कार्यकर्ताओं ने, प्रेजेंटेशन, गूगल डॉक, ईमेल, कांफ्रेंस कॉल आदि आदि …डोनर ने हमें राह दिखा दी, और हम चल पड़े उसी राह पर, सब कुछ भूल कर;  आंगन विरान हो गए, मिलना जुलना भूली बात हो गयी | गाँव के बीच हमारा वजूद एक फंतासी सा लगने लगा | आखिर इस ग्रामीण अंचल में बैठे हम कर क्या रहे हैं ?

IMG_20170508_162729184_HDRमैं खुद कम से कम 6-7 संस्थाओं को जानता हूं जिनके खूबसूरत कैंपस आज भी चहल पहल का इंतजार कर रहे हैं – एक अर्थपूर्ण संवाद का; और मेरा यह मानना है कि यह  सब थोड़े से प्रयास से संभव है |

इस दिशा में, हिमालय ट्रस्ट और समता  (विकास नगर) एक संयुक्त प्रयास  कर  रहे हैं | हमारा लक्ष्य है ऐसे ग्रामीण सुविधाओं को पुनर्जीवित करना जहां स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय और अन्य संगठन (देश और विदेश से भी) अपने समूहों को भेज सकें; संवाद, अनुभव और सेवा के लिए; ऐसे कई संगठन रुचि तो रखते हैं पर अपने समूह कहां भेजें, इस पर बहुत स्पष्ट नहीं है |

ऐसी एक छोटी सी शुरुआत हमें कहां कहां नहीं ले जाएगी यह कहना मुश्किल है! कुछ भी मुमकिन है ! मगर मेरा यकीन है कि ऐसे क्रिया-कलाप न केवल संस्थाओं को कुछ आय देंगे बल्कि विचारों के आदान प्रदान और नए वालंटियर्स की तलाश में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं |

मेरा कोई साथी जल्दी ही आप से इस बारे में मिलेगा |  पर इससे पहले मैं आपसे फोन पर इस बारे में विचार विमर्श करना चाहूँगा | अगले 6 से 8 हफ़्तों में हम इस प्रयास को आपके सहयोग से आगे बढ़ा सकते हैं |

तब तक ढ़ेर सारी शुभकामनाओं के साथ,

भवदीय

सीरिल रफेल (सचिव – हिमालय ट्रस्ट) और डॉ. सत्येन्द्र श्रीवास्तव (सचिव –  समता)

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